श्री माथुर चतुर्वेदी महासभा

श्री माथुर चतुर्वेदी महासभा

Chaturvedi Mahasabha

महासभा का संक्षिप्त इतिहास - भरत चतुर्वेदी 'अचल'(होलीपुरा/रिसड़ा)

श्री माथुर चतुर्वेदी महासभा की स्थापना का बीजारोपण सही मायने में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत‍ सन् 1857 में आरम्भ हो गया, सर्वप्रथम पंडित जगन्नाथ जी चौबे (इटावा) एवं पंडित दम्भीलाल जी मिश्र (मैनपुरी) के भागीरथ प्रयासों ने इसके लिए चिन्तन बैठकों का दौर शुरू कर दिया । परिणामस्वरूप समय-समय पर समाज को संगठित करने की योजनाएं निर्धारित की जाने लगी और सन् 1873 में नियमित बैठकों का दौर आरंभ हो गया ।अंन्ततोगत्वा सन् 1890 में समाज को जागृत करने के उद्देश्य से पंडित राधा रमन जी (मैनपुरी) के द्वारा एक बैठक आहूत की गई। जिसमें समाजोन्नति के उद्देश्य से एक पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय लिया गया। फलत: पं0 राधाकृष्ण जी (सिकन्दरपुर) के संपादन में 'चतुर्वेदी चंद्रिका' का प्रवेशांक कोलकाता से प्रकाशित हुआ। चंद्रिका का यह प्रशासन अपने शैशवकाल में मात्र एक वर्ष में ही अर्थाभाव के कारण बंद हो गया , लेकिन वह अपनी उद्देश्य पूर्ति में सफल रही। परिणामस्वरूप पंडित मनोहर दास जी पांडे (इटावा) एवं पंडित मुन्नालाल जी (मैनपुरी) के सद् प्रयासों से सन् 1893 में आगरा स्थित छात्रों द्वारा एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें चतुर्वेदी संगठन नाम की संस्था स्थापित की गई । इस संस्था द्वारा नियमित बैठकें एवं वार्षिकोत्सव आयोजित किए जाते रहे। धीरे-धीरे समाज जागृत हो।

कुरीतियों के उन्मूलन के स्वर मुखर हो उठे एवं शिक्षा के प्रचार हेतु कई स्कूल खोले गए तथा क्रियान्वित भी हुए,चूंकि जमींदारी व्यवस्था के कारण तत्कालीन समाज में हमारे गांव सुख - समृद्धि के प्रतीक थे। परिणाम स्वरुप संगठन पर समाज की पकड़ भी मजबूत होने लगी साथ ही विरोध के स्वर भी मुखर होना स्वाभाविक था। इसी कड़ी में पंडित अयोध्या प्रसाद जी (आगरा) ने सन् 1915 में चतुर्वेदी चंद्रिका के पुनः प्रशासन का बीड़ा उठाया तथा पत्रिका अर्थाभाव के कारण पुन: बंद ना हो इसके लिए मांगलिक अवसरों पर पत्रिका सहायतार्थ अनुदान लेना आरंभ किया गया । लगभग 6 दशकों के लंबे समय के सद्प्रयासों के बाद बृहद संगठन के गठन का पथ प्रशस्त हुआ और सन् 1920 के मार्च महीने में महासभा का पंजीकरण कराया गया। पंडित राधेलाल जी (मेरठ) द्वारा तैयार नियमावली पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्य जो महासभा के संस्थापक सदस्य के रूप में स्थापित हुए इस प्रकार हैं -पंडित बैजनाथ जी (इटावा), पंडित राधेलाल जी वकील (मेरठ), रायसाहब छक्कनलाल जी (होलीपुरा),पंडित बालकृष्ण जी (सिकंदरपुर), पंडित गिरधर शर्मा जी (जयपुर), पंडित निर्मल दास जी मिश्र (मैनपुरी),पंडित खेतलदास जी (मैनपुरी),पंडित विश्वेश्वर दयाल जी 'विशारद' (आगरा) एवं पंडित अयोध्या प्रसाद जी पाठक (आगरा)।

महासभा पंजीकरण की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद मेरठ के उत्साही बान्धवों द्वारा मथुरा में प्रथम अधिवेशन 25-26 दिसम्बर 1920 को आमन्त्रित किया। उल्लेखनीय है कि आम सहमति द्वारा पूर्व में ही सभापति चयन करने की प्रक्रिया समाज ने ग्रहण की जिसके अन्तर्गत प्रथम अधिवेशन दानवीर बैजनाथ जी (चन्द्रपुर/इटावा) के सभापतित्व में हुआ।आपके मंत्री पं प्यारेलाल जी (चन्द्रपुर) एवं सम्पादक पं0आनन्दी प्रसाद जी (मलयपुर )हुए।

द्वितीय अधिवेशन- 28-30 अक्टूबर 1922 को पं0 राधेलाल जी (मेरठ) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। आपके मंत्री पंडित चम्पाराम जी (फिरोजाबाद) एवं सम्पादक पं०गिरिधर शर्मा जी (जयपुर) नियुक्त हुए।

तृतीय अधिवेशन - 25-27 दिसम्बर,1923 को कलकत्ता में महामहोपाध्याय पंडित गिरिधर शर्मा जी (जयपुर) के सभापतित्व में हुआ।आपके मंत्री पं० जगदीश प्रसाद जी (फरुखाबाद) एवं सम्पादक का दायित्व स्वयं सभापति पं० गिरिधर शर्मा जी ने सम्हाला।

चतुर्थ अधिवेशन - 31जुलाई और 1 अगस्त,1925 को मथुरा में रायबहादुर प्यारेलाल जी ( चन्द्रपुर) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।आपके सम्पादक पं० प्यारे मोहन जी( इटावा) हुए।

पंचम अधिवेशन - 26 दिसम्बर 1926 को पं0 मुन्ना लाल जी (मैनपुरी) की अध्यक्षता में इटावा में सुसम्पन्न हुआ।आपके सम्पादक का दायित्व पं० प्यारे मोहन जी (इटावा) ने सम्हाला।

षष्ठम अधिवेशन - महासभा का छठा अधिवेशन 25-26 दिसम्बर 1927 को ग्वालियर में पं0 राधेलाल जी 'डिप्टी साहब'(होलीपुरा) के सभापतित्व में हुआ। सम्पादक का दायित्व पुनः पं० प्यारे मोहन जी( इटावा) ने सम्हाला। सप्तम अधिवेशन - 25-27 मई 1929 को महामहोपाध्याय पंडित गिरिधर शर्मा जी ( जयपुर) की अध्यक्षता में कानपुर में सम्पन्न हुआ। सम्पादक पं० प्यारे मोहन जी (इटावा) रहे ।

अष्टम अधिवेशन - 25-27 दिसम्बर 1930 को हास्य रसावतार जगन्नाथ प्रसाद जी (मलेपुर) की अध्यक्षता में इलाहाबाद में सम्पन्न हुआ।सम्पादक पंं० प्यारे मोहन जी (इटावा) सन् 1930 तक तथा सन् 1931 से पं0 कालिका प्रसाद जी (सिकन्दरपुर) रहे।

नवम अधिवेशन - 15-17 मई 1932 को इटावा में नौवां अधिवेशन पं0 मुन्ना लाल जी 'सूबा साहब' (मैनपुरी) की अध्यक्षता में हुआ। आपके सम्पादक पं० कालिका प्रसाद जी (सिकन्दरपुर) रहे।

दशम अधिवेशन - 25-27 दिसम्बर 1933 को इटावा में दसवां अधिवेशन पं0 विश्वेश्वर दयाल जी 'विशारद'(आगरा) के सभापतित्व में हुआ। सम्पादक का दायित्व पुनः:पं० कालिका प्रसाद जी (सिकन्दरपुर)‌ने सम्हाला ।

ग्यारहवां अधिवेशन - 24-26 दिसम्बर 1934 को आगरा में कुंवर कृष्णा नन्द जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।आपके मंत्री पं0 निर्मल चन्द्र जी (कछपुरा) एवं सम्पादक पं० सूर्य नारायण जी मिश्र(मिर्जापुर) हुए। द्वादश अधिवेशन - 25-27 दिसम्बर 1936 को लखनऊ में पं0 शालिग्राम जी पाठक (मैनपुरी) की अध्यक्षता में हुआ। सम्पादक पं० सूर्य नारायण जी मिश्र( मैनपुरी) रहे।

त्रयोदश अधिवेशन - 25-27 दिसम्बर 1938 को कानपुर में राय साहब लक्ष्मीनारायण जी मिश्र (मई/मिर्जापुर) के सभापतित्व में हुआ।आपके मंत्री पं० रामस्वरूप जी (कछपुरा) एवं सम्पादक पं० सूर्य नारायण जी मिश्र ( मैनपुरी) हुए। अन्तरिम सभापति - सभापति पं0 लक्ष्मीनारायण जी मिश्र द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के कारण प्रोफेसर श्रीनिवासन शास्त्री जी(इन्दौर) को सभापति का भार सौंपा गया साथ ही चतुर्दश अधिवेशन हेतु सभापति का सर्वसम्मति से आपके नाम का निर्णय लिया गया । दुर्भाग्यवश कार्यकारिणी बैठक से लौटते समय अधिवेशन से पूर्व ही आपका देहावसान हो गया।आपके मंत्री पं० रामस्वरूप जी (कछपुरा) एवं सम्पादक पं० लाडली प्रसाद जी (अनूपशहर) रहे।

चतुर्दश अधिवेशन - 28-29 जून 1941 को पं० श्री नारायण जी (इटावा) की अध्यक्षता में बाह में हुआ। आपके सम्पादक पं० महावीर प्रसाद जी रहे।

पंद्रहवां अधिवेशन - 25-26 दिसम्बर 1943 को राय साहब लक्ष्मीनारायण जी मिश्र (मई/मिर्जापुर) की अध्यक्षता में दिल्ली में हुआ। आपके मंत्री पं0 धर्म गोपाल जी (पुरा) तथा सम्पादक पं० महावीर प्रसाद जी हुए।

सोलहवां अधिवेशन - यह अधिवेशन ग्राम पिनाहट में पं० जगदीश प्रसाद जी (फरुखाबाद)‌की अध्यक्षता में सन् 1945 को हुआ।आपके सम्पादक पं0महावीर प्रसाद जी ने सन् 1946 तक तथा सन् 1947 से पंडित ऋषीकेश जी रहे।

सत्रहवां अधिवेशन एवं रजत जयन्ती समारोह - 25 दिसम्बर 1948 को पं0 जगदीश प्रसाद जी (फरुखाबाद)‌ की अध्यक्षता में आगरा में सम्पन्न हुआ। सम्पादक पं० हृषीकेश जी हुए। जबकि रजत जयन्ती समारोह की अध्यक्षता महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा जी ( जयपुर) ने की।

अठारहवां अधिवेशन - फरुखाबाद में अक्टूबर 1950 को पं0 निर्मल चन्द्र जी (कछपुरा) की अध्यक्षता में हुआ।आपके मंत्री पं0 रामस्वरूप जी (कछपुरा) एवं सम्पादक पं० सूर्य नारायण जी (मिर्जापुर)1954 तक उसके बाद पं0 सुरेश चंद्र जी (फरौली) रहे।

उन्नीसवां अधिवेशन - 1 जुलाई 1956 को पं0 कालिका प्रसाद जी (सिकन्दरपुर) की अध्यक्षता में लखनऊ में हुआ।आपके सम्पादक पं० राजेश्वर प्रसाद जी (आगरा) रहे ।

बीसवां अधिवेशन - 29 मई 1960 को प्रोफेसर चम्पा राम जी (फिरोजाबाद) की अध्यक्षता में हुआ। आपके मंत्री पं० रघुनाथ प्रसाद जी (आगरा) एवं सम्पादक सम्भवतः पं०अयोध्या प्रसाद जी पाठक रहे।

इक्कीसवां अधिवेशन - 26 फरवरी 1968 को आगरा में पं0 मिश्रीलाल जी (बटेश्वर) की अध्यक्षता में हुआ।आपके मंत्री पं0 लक्ष्मण कुमार जी (कमतरी/प्रयाग)एवं सम्पादक पं० भरत चन्द्र जी (मैनपुरी) हुए तथा उनके त्यागपत्र देने पर पं महेश चन्द्र जी कार्यवाहक सम्पादक रहे।

बाईसवां अधिवेशन -13-14 मई 1972 को पं0 शम्भू नाथ जी (इन्दौर) की अध्यक्षता में कानपुर में हुआ।आपके मंत्री पं० वृन्दावन बिहारी जी एवं सम्पादक पं० प्रेमनाथ जी (भरतपुर) हुए।

यहां तक हम कह सकते हैं कि यह महासभा का यह स्वर्णिम काल था ।इसी काल में समाज के मनीषियों के अथक प्रयास से महासभा का पंजीकरण एवं विधिवत गठन सम्भव हो सका तथा उनके दूरदर्शी सोच द्वारा समाज की तत्कालीन अनेक कुरीतियों का उन्मूलन भी सम्भव हो सका।अशिक्षा को दूर करने के उद्देश्य से स्कूल भी इसी काल में खोले गए तथा पत्रिका का प्रकाशन सुचारू रुप से सुनिश्चित किया। इसी दौर में सन् 1937 में पं0 मदन मोहन जी (इटावा) सन् 1939 में पं0 राम नारायण जी (प्रयाग)‌एवं सन् 1939 में ही पं 0 लक्ष्मीनारायण जी (मई/मिर्जापुर) की अध्यक्षता में विशेष अधिवेशन हुए।

यहां यह उल्लेखनीय है कि यहां तक सभापति आमराय से सर्वसम्मति से चयनित करने की परम्परा रही है इसके बाद मतपत्र द्वारा सभापति के निर्वाचन की प्रक्रिया अपनाई गई।>

तेईसवां अधिवेशन - 12-14 नवम्बर 1976 को सर्वप्रथम मतपत्रों द्वारा निर्वाचित हुए मास्टर रामलाल जी (तरसोखर) की अध्यक्षता में फरौली में सम्पन्न हुआ। आपके मंत्री पं० उपेन्द्र नाथ जी (पुरा) एवं सम्पादक पं० गजाधर प्रसाद जी (तरसोखर) हुए।

चौबीसवां अधिवेशन - 13-15 मार्च 1981 को पं0 पृथ्वीनाथ जी ( होलीपुरा )की अध्यक्षता में कानपुर में हुआ।आपके मंत्री पं० महेन्द्र नाथ जी (होलीपुरा) एवं सम्पादक पं० गजाधर प्रसाद जी (तरसोखर) रहे। पच्चीसवां अधिवेशन - 25-26 अक्टूबर 1985 को चन्द्रपुर में पं0 गजाधर प्रसाद जी ( तरसोखर)के सभापतित्व में हुआ।आपके मंत्री पं0 नरेश चंद्र जी (करहल) त्यागपत्र के बाद पं0 नेमचंद्र जी (चन्द्रपुर) एवं सम्पादक पं० मुनीन्द्र मोहन जी (इटावा) बाद में प्रोफेसर हरेश चन्द्र जी (पुरा) हुए।

छब्बीसवां अधिवेशन 14अक्टूबर1989 को पं0 बृजेन्द्र नाथ जी (मैनपुरी) के सभापतित्व में हरदोई में हुआ।आपके मंत्री पं0 उपेन्द्र नाथ जी (पुरा) एवं सम्पादक पं० दिनेश चन्द्र जी (मैनपुरी)हुए।

सत्ताईसवां अधिवेशन - 15 अक्टूबर 1995 को पं0 महेश प्रसाद जी (मैनपुरी) की अध्यक्षता में वाराणसी में हुआ।आपके मंत्री श्री नीलमणि कुमार जी (कमतरी/वाराणसी) एवं सम्पादिका डा० मीरा जी (ग्वालियर) हुई। इसे हम महासभा का मध्य काल कह सकते हैं।इसी दौर से सभापति निर्वाचन की प्रक्रिया आरम्भ हुई इसी काल में जन जागरण हेतु विभिन्न शहरों में बैठकों का दौर भी आरम्भ हुआ, संविधान संशोधन हुए तथा जहां पुराने कोषों की समीक्षा महत्वपूर्ण रही वहीं इसी दौर में न्यायालय तक विवाद जाने से लगभग एक दशक तक महासभा की प्रायः गतिविधियां ठप सी हो गईं।

अट्ठाईसवां अधिवेशन -29-30 अगस्त 1998 को वैद्य सुरेश चंद्र जी (भरतपुर) की अध्यक्षता में बम्बई में हुआ। आपके मंत्री पं० मिथिलेश जी (होलीपुरा) एवं सम्पादक पं० रवीन्द्र नाथ जी (इटावा) तथा 1999 से प्रधान सम्पादक पं0 रवीन्द्र नाथ जी व सम्पादक श्री पुरुषोत्तम जी (मथुरा) रहे।

उन्नीसवां अधिवेशन -26-28 अप्रैल 2002 को पं0 केदारनाथ जी (होलीपुरा) की अध्यक्षता में नागपुर में हुआ। आपके मंत्री पं० सर्वेश जी (चन्द्रपुर) त्यागपत्र के बाद डा० प्रदीप जी (होलीपुरा) एवं सम्पादक पं० मिथिलेश जी (होलीपुरा) हुए।

तीसवां अधिवेशन - 15-16 अक्टूबर 2005 को श्री भरत चन्द्र जी (पुरा) की अध्यक्षता में भोपाल में हुआ। आपके मंत्री डा० प्रदीप जी (होलीपुरा) एवं श्रीमती विनीता जी (भोपाल) सम्पादिका रही।

इक्कतीसवां अधिवेशन - 13-14 जून 2009 को नैमिषारण्य में पं0 राजेन्द्र नाथ जी 'रज्जन' (होलीपुरा) के सभापतित्व‌ में हुआ। आपके मंत्री डा० प्रदीप जी (होलीपुरा) एवं सम्पादिका श्रीमती विनीता जी (भोपाल) रहीं।

बत्तीसवां अधिवेशन - 21-22 अप्रैल 2013 को श्री राजेन्द्र रमेश जी (मथुरा) की अध्यक्षता में दिल्ली में हुआ। आपके मन्त्री डा० प्रदीप जी (होलीपुरा) एवं सम्पादिका श्रीमती विनीता जी (भोपाल) रहीं।

तैंतीसवां अधिवेशन- 2-3 सितम्बर 2017 को मैनपुरी में श्री कमलेश पाण्डे जी(मैनपुरी) की अध्यक्षता में हुआ। आपके मंत्री श्री मुनीन्द्र नाथ जी (होलीपुरा) एवं सम्पादक डा० कुश जी (इटावा) रहे ,जबकि पत्रिका व्यवस्थापक श्री शशांक जी (कछपुरा) हुए।

चौंतीसवां अधिवेशन - 4 अक्टूबर 2020 को महासभा कार्यालय दिल्ली से आनलाइन प्रथम निर्विरोध निर्वाचित डा0 प्रदीप जी ( होलीपुरा) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।आपके मंत्री श्री मुनीन्द्र नाथ जी (होलीपुरा) एवं सम्पादक श्री शशांक जी (कछपुरा/भोपाल) हुए।इस काल में कविता विशेषांक,शौर्य विशेषांक महिला विशेषांक, होली के लोक गायकों व ढोलक वादकों को प्रोत्साहित किया गया।

पैंतीसवां अधिवेशन -15-16 जून 2024 को भोपाल में प्रथम महिला सभापति श्रीमती ऊषा जी (पुरा/भोपाल)‌ की अध्यक्षता में हुआ। आपके मंत्री श्री शशांक जी (कछपुरा/भोपाल) एवं श्री दिलीप जी (सिकन्दरपुर) सेवारत हैं।

इसके अलावा पत्रिका के विभिन्न विशेषांकों के सम्पादक पंं० बनारसी दास जी (फिरोजाबाद), पं० विश्वेश्वर दयाल जी (आगरा),पं० लक्ष्मी निधि जी( मैनपुरी), पं० सतीश चन्द्र जी (आगरा) एवं श्री भरत जी (होलीपुरा) रहे।

एक दशक के लम्बे अन्तराल के पश्चात नई सदी के आरम्भ से पूर्व एक नई उर्जा के साथ महासभा की विकास-यात्रा पुनः: बम्बई अधिवेशन से आरम्भ हुई जो आज भी समाजोन्नति के मार्ग पर अबाध गति से अग्रसर है जिसे हम नवदिगन्त काल कह सकते हैं।इसी काल में महासभा सभापति द्वारा संरक्षक मनोनीत करने की प्रक्रिया आरम्भ हुई‌ जिसके अन्तर्गत अब तक श्री दीनानाथ जी (मथुरा),डा० सतीश चन्द्र जी (होलीपुरा),पं० ललित किशोर जी (जयपुर),पं० राधेलाल जी ( जयपुर),पं०उपेन्द्र नाथ जी(पुरा), श्री त्रिभुवन नाथ जी (होलीपुरा), लेफ्टि. जनरल श्री विष्णु कान्त जी (फतेहगढ़),श्री मदन कुमार जी (होलीपुरा),श्री बालकृष्ण जी (इटावा),श्री विकास जी 'चुन्ना भैय्या (होलीपुरा), श्री सन्तोष जी चौबे (भोपाल), श्री देवेन्द्र नाथजी (गोन्दिया) एवं श्री महेश जी(दिल्ली) मनोनीत किए गए हैं। इसी दौर में विभिन्न शहरों में बैठकों के पश्चात स्थानीय बान्धवों का सम्मान एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आरम्भ हुए। परिणामस्वरूप पत्रिका एवं महासभा की सदस्यत संख्या में वृध्दि हुई है। अन्नपूर्णा योजना एवं छात्रवृत्ति जैसी कल्याण कारी याजनायें भी इसी काल की उपलब्धि हैं। अतः: महासभा की यह यात्रा सभापति श्रीमती ऊषा जी एवं मन्त्री श्री शशांक जी के नेतृत्व में निर्बाध इसी भांति अग्रसर रहे इसके लिए भावी चुनौतियों के हवन में आप सबकी यथासंभव आहुति की कामना करते हैं।

महासभा की प्रथम महिला सभापति श्रीमती ऊषा चतुर्वेदी (पुरा/भोपाल)

श्रीमती ऊषा जी का जन्म 1 जनवरी 1950 को चन्द्रपुर में स्व. श्री सुरेन्द्र नाथ जी की पुत्री के रूप में हुआ। शिक्षा - दीक्षा पूर्ण कर आपने एम. ए.बी.एड. एवं एल.एल.बी. की उपाधियां प्राप्त की।‌ आप श्री भरत जी (पुरा/भोपाल) के साथ परिणय सूत्र में बंधी और भोपाल आ गईं। सन् 1994 से सन् 2004 तक आप भोपाल नगर पालिका निगम की पार्षद के साथ स्थाई समिति की भी सदस्य रहीं। इसके बाद आप मध्य प्रदेश राज्य समाज कल्याण बोर्ड की दो बार अध्यक्षा बनीं। आप मध्य प्रदेश राज्य बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की अध्यक्षा रहीं। वर्तमान में आप निवसेट,नई दिल्ली में मध्य प्रदेश की सदस्या थीं। साथ ही मध्य प्रदेश राज्य की प्रदेश स्तरीय महिला एवं बाल विकास पुरुस्कार चयन समिति की भी सदस्या रही हैं।सामाजिक क्षेत्र में आप भोपाल चतुर्वेदी समाज की सक्रिय कार्यकर्ता रही। आपने चतुर्वेदी गुइयां नामक व्हाइट्एप ग्रुप का निर्माण श्रीमती शिवांगी जी के साथ किया और भोपाल ही नहीं देश की महिलाओं को मंच प्रदान करने का भगीरथ प्रयास किया। इससे पूर्व आप महासभा के महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय संयोजिका के पद पर आसीन थीं। जिसके अन्तर्गत आपने कई कार्यक्रम भी कराये। आप महासभा में दो बार उपाध्यक्ष का पद सुशोभित कर चुकीं है। आपकी इन्हीं सेवाओं के लिए समय-समय पर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान, राष्ट्रीय सेवा पदक, चतुर्वेदी श्री सम्मान, स्व. लाडो देवी सम्मान, वीरांगना सम्मान एवं महिला समाज सेवी सम्मान से विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। आपकी लेखन में भी विशेष रुचि रही है, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपके लेख प्रकाशित होते हैं। आपकी पुस्तकें जैसे- स्वतंत्रता काल की विरांगनायें,वैदिक काल की विदुषियाएँ प्रकाशित हुई हैं। महासभा सभापति चुनाव के समय 73 वर्ष की आयु में भी लखनऊ, कानपुर, आगरा, ग्वालियर, मैनपुरी, जयपुर एवं भदावर के गांवों का दौरा करना आपकी समाजोत्थान हेतु सक्रियता का परिचायक है। ऐसी ऊर्जावान, विदुषी महिला का महासभा सभापति के रूप में चुना जाना नि:सन्देह प्रसन्नता की बात है। सभापति के रूप में आपके दीर्घ अनुभव, उर्जा एवं अदम्य समाज प्रेम के बल पर महासभा को नई ऊंचाइयां हासिल होंगी ।