Chaturvedi Mahasabha
महासभा का संक्षिप्त इतिहास - भरत चतुर्वेदी 'अचल'(होलीपुरा/रिसड़ा)
श्री माथुर चतुर्वेदी महासभा की स्थापना का बीजारोपण सही मायने में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत सन् 1857 में आरम्भ हो गया, सर्वप्रथम पंडित जगन्नाथ जी चौबे (इटावा) एवं पंडित दम्भीलाल जी मिश्र (मैनपुरी) के भागीरथ प्रयासों ने इसके लिए चिन्तन बैठकों का दौर शुरू कर दिया । परिणामस्वरूप समय-समय पर समाज को संगठित करने की योजनाएं निर्धारित की जाने लगी और सन् 1873 में नियमित बैठकों का दौर आरंभ हो गया ।अंन्ततोगत्वा सन् 1890 में समाज को जागृत करने के उद्देश्य से पंडित राधा रमन जी (मैनपुरी) के द्वारा एक बैठक आहूत की गई। जिसमें समाजोन्नति के उद्देश्य से एक पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय लिया गया। फलत: पं0 राधाकृष्ण जी (सिकन्दरपुर) के संपादन में 'चतुर्वेदी चंद्रिका' का प्रवेशांक कोलकाता से प्रकाशित हुआ। चंद्रिका का यह प्रशासन अपने शैशवकाल में मात्र एक वर्ष में ही अर्थाभाव के कारण बंद हो गया , लेकिन वह अपनी उद्देश्य पूर्ति में सफल रही। परिणामस्वरूप पंडित मनोहर दास जी पांडे (इटावा) एवं पंडित मुन्नालाल जी (मैनपुरी) के सद् प्रयासों से सन् 1893 में आगरा स्थित छात्रों द्वारा एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें चतुर्वेदी संगठन नाम की संस्था स्थापित की गई । इस संस्था द्वारा नियमित बैठकें एवं वार्षिकोत्सव आयोजित किए जाते रहे। धीरे-धीरे समाज जागृत हो।































